बुधवार, 22 जून 2016

मेरी गिलहरी

गिलहरी मेरे बग़ीचे की .
स्वतन्त्र , उन्मुक्त .
लोक लाज से ,
वस्त्रों से ,
लिंग भेद से,
भ्रूण हत्या से,
जातियों से ,
आरक्षण से ,
कुरीतियों से ,
शादी , दहेज़ से ,
स्कूली शिक्षा से ,
पदवी से ,
वादों से ,
कृत्रिम शारीरिक सुंदरता से ,
कृत्रिम प्रेम से ,बातों से ,
देह के अकारण भूख से ,
बस प्रेम करते हैं ..
किसी से भी कभी भी कहीं भी ,
उनके समाज में दंगे नहीं होते हैं ,
खून नहीं बहाया जाता है किसी का भी ,
बस प्रेम करते हैं ...
माणिक्य बहुगुना / पंकज / चन्द्र प्रकाश

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