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मैं

मैं देश की तरक्की चाहता हूँ ..
     लेकिन टैक्स चोरी मैं ही करता हूँ ।
मैं स्वच्छ भारत मिशन में साथ हूँ ..
    कूड़ा सड़कों में नदियों में मैं ही फेकता हूँ ।
मैं काला धन भारत में लाना चाहता हूँ ..
     मैं ही तो रिश्वत लेता हूँ ।
मैं सरकारी टीचर बनना चाहता हूँ ..
     लेकिन खुद के बच्चों को पब्लिक स्कूल में पढता हूँ ।
मैं ही तो हूँ जो अपनी माँ बहन को इज्जत देना चाहता हूँ .
  मैं ही बात बात में तेरी माँ तेरी बहन कहता हूँ ।
मैं ही गाय को माँ कह कर अनशन करता हूँ ..
     मैं ही बूचड़खाने में मांस की खरीददारी करता हूँ ।
मैं ही पत्थर , कब्र को पूजता हूँ  .....
    मैं ही अपने माँ पिता को वृद्धा आश्रम छोड़ आता हूँ ।
मैं ही खुद के बच्चों को समझा पाने में असमर्थ होता हूँ ..
   मैं ही हर किसी को सलाह देता फिरता हूँ ।
मैं ही हर नवरात्र लड़की को पूजते हूँ ..
     मैं ही उस नन्हे भ्रूण हो मार देता हूँ ।
मैं ही दहेज़ प्रथा को अभिशाप मानता हूँ ..
     मैं ही तो दहेज़ चाहता हूँ ।
मैं ही तो मिलावट करता हूँ ..
     फिर मैं ही शुद्ध चाहता हूँ ।
मैं ही जमीन काट ,जंगल काट घर बना रहा हूँ ..
     मैं ही पर्यावरण की चिंता करता हूँ ।
मैं ही पत्नी को अर्धागिनी मानता हूँ ..
     मैं ही पत्नी से एक सलाह लेना तक नहीं चाहता हूँ ..।
मैं ही तो राजा हूँ , रंक मैं ही तो हूँ ..
मैं ही जनतन्त्र , लोकतंत्र मैं ही हूँ ..।

माणिक्य बहुगुना / चंद्रप्रकाश /पंकज

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प्यार

वो लड़की बहुत अच्छी लगती है ..
जो मेरे यादों में बसती है ।
मेरे आँखों की नमी देख ...
जो खुद रो पड़ती है ।
जो मेरे हँसने में ..
खुद हँस पड़ती है ।
जिसे में अंतस में समेटे रहता हूँ ...
उस बात को बोल देती है ।
वह जो मेरी खुसी में ..
खुद की खुसी जोड़ देती है ।
उससे बातें करना अच्छा लगता है ..
और मेरे दिल को ठण्डक देती है ।
हजारों लाखों में ..
बस वही अच्छा लगती है ।
लेकिन क्यों ?
नहीं जनता ।
उसे में महसूस करता हूँ---------
सूरज की लाली में ..
रात काली में ।
पूनम में , अमावस में ..
जल में,थल में ।
पानी की घूँट में ..
दिन रात में ।
भोजन में , भजन में ..
आरती में वन्दना में ।
सोने में उठने में ..
चिड़ियों के चहकने में ।
दिन की कड़क धूप में..
बादलों की छाँव में ।
सब में , शराब में ..
गुलसन में , शबनम में ।
प्रेम में प्रेमी जोड़ों में ..
गुस्से में लड़ाई में ।
पंखे की हवा में .
रोशनदानों में ।
रौशनी में , अँधेरे में ...
सुबह सबेरे में ।
फूलों में पत्तें में ...
सरोवर झीलों में ।
पानी में , भोजन में ..
किताब की हर शब्द में ।
गम में खुसी में ..
अकेलेपन में , साथ में ।
गीतों की धुन में ..
सरगम की तानों म…

शायरी

1
तुम्हारी आँखे सब बोलती हैं लबों को मत बोलने दो ....
अभी अभी तो प्यार में खोया हूँ खो जाने दो ....
तुम मुझे मदहोश कर देती हो ...
ये मदहोशी के जाम मुझे पीने दो ....।।
                       2
वो मुझ से हर बात ख़फ़ा रहता ....
वो हर बात में फ़ायदे की बात करता ...
फिर भी न जाने क्यों उसकी आँखों से लगता ......
वो प्यार अभी भी मुझीसे ही करता ...

प्रेम

मुझे इतने प्रेम से गले मत लगाओ ..
मुझे देश के लिए लड़ना है
मैं कमज़ोर न पड़ जाऊँ ..
तुम ईश्वर से प्रार्थना करना ।
मैं अगर मर जाऊँ लड़ते लड़ते ..
मुझे बस एक बार छू लेना  ..
मेरे बच्चों को मुझे मत दिखाना ..
क्या पता मैं उठ जाऊँ ?
तुम दूसरा विवाह कर लेना ..
अगर मैं ना लौटा तो ..
मेरा पैसा , घर तुम्हारे नाम पे है ..
तुम ख़ुश रहना  ऐसे ही ।
मेरी रुह तुम्हारा दुःख सहन नहीं कर पाएगी ...
तुम मेरे बचे अंगों को जलाना मत ,
दफनाना मत , दान कर देना ।
मैं तुम्हारी ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाया ...
ना ही तुम्हें प्यार दे पाया जिसपे तुम्हारा हक़ था ..
मैं तुम्हारा अपराधी बन सकता हूँ .
देश का नहीं ।
तुम मेरी किताबें , तुम्हारे प्रेम पत्र जलाना मत ..
मेरी और तुम्हारे कुछ फोटोज हैं उन्हें फेंकना मत ..
तुम खिडकियाँ खोले रखना मैं तुम्हें देखने आया करूँगा ...
हवा , पानी , रोशनी , अंधेरा बन कर ।
माणिक्य बहुगुना