सोमवार, 4 जुलाई 2016

आपदा

कहर !
       प्रकृति का या मानव का प्रकृति पर ?
कौन निश्चित करेगा ?
कौन मरेगा , कौन बचेगा ..?
      पर्वत खोद कर बेच डाले ..
      जंगल जला खाक कर डाले ।
सोचता हूँ मैं सुखी रहूँगा किसी को मारकर ..
नहीं मिलेगा तुझे भी सुख औरों को काटकर ।

दोहन -
       प्रकृति या खुद का ?
खुद बचना है तो बचाना होगा .
प्रकृति को बचा कर खुद बचना होगा ।

प्रलय -
       
         क्या है ?
प्रकृति का कहर , मानव का कहर मानव पर ?
 
खुद को बचाने की कोशिश  कर रहा है मानव .
ना जाने फिर क्यों प्रकृति उजाड़ रहा है मानव ।
प्रलय । विकाश का , विज्ञान का ..
मंजर है हर कदम विनाश का ।।

माणिक्य / चंद्र प्रकाश / पंकज

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